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गुरुवार, 22 मई 2014

पहली कुमाउनी, गढ़वाली व जौनसारी लोक भाषाओं की मासिक पत्रिका ‘कुमगढ़’ प्रकाशित

उत्तराखंड की पहली कुमाउनी, गढ़वाली व जौनसारी सहित समस्त लोक भाषाओं की मासिक पत्रिका ‘कुमगढ़’ का पहला अंक प्रकाशित हो गया है।

पत्रिका की प्रति सुरक्षित करवाने, नियमित या आजीवन सदस्यता लेने एवं आगामी अंकों के लिए अपने मौलिक लेख, कविताएं आदि प्रेषित करने के लिए पताः
श्री दामोदर जोशी ‘देवांशु’
संपादक-कुमगढ़ पत्रिका
हिमानी वाङमय पीठ, पश्चिमी खेड़ा, पोस्ट-काठगोदाम, जिला-नैनीताल, पिन-263126। मोबाइलः 9719247882। ईमेलः kumgarh@gmail.com ।

सदस्यता राशिः सदस्यता (संरक्षक): रुपए 5000
आजीवन सदस्यताः रुपए 1000
विशेष सहयोगः रुपए 500
वार्षिक सहयोगः रुपए 100
एक प्रतिः रुपए 20

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

कुमाउनीं के पहले पुस्तक के साथ P.D.F. फॉर्म में भी प्रकाशित कविता संग्रह ‘उघड़ी आंखोंक स्वींण’ का विमोचन

मेरी कुमाउनी कविताओं का संग्रह: उघड़ी आंखोंक स्वींड़ (लिंक क्लिक कर के PDF फॉर्मेट में पढ़ सकते हैं। )

आपकी अनेकों Querries के उत्तर में बताना है कि पुस्तक की सहयोग राशि रूपए 250 है। इसे P.D.F. फोर्मेट में रूपए 150 में (S.B.I. नैनीताल के खाता संख्या 30972689284 में जमाकर) ई-मेल से भी मंगाया जा सकता है।

सुविधा के लिए पुस्तक नैनीताल के मल्लीताल स्थित कंसल बुक डिपो एवं माल रोड स्थित नारायंस में उपलब्ध करा दी गयी है।

मेरी  चुनिन्दा कुमाउनी कवितायें मेरे ब्लॉग 'ऊंचे पहाड़ों से.… जीवन के स्वर' में भी देख सकते हैं।

बधाइयों, शुभकामनाओं एवं आशीर्वाद के लिए सभी मित्रों / अग्रजों का धन्यवाद, आभार,
संपर्क करें:
saharanavinjoshi@gmail.com
Mobile: 9412037779, 9675155117.

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

पनर अगस्ता्क दिन


आज छि छुट्टि
करौ मैंल ऐराम
स्येई रयूं दिनमान भरि
लगा टी.बी.-
क्वे पिक्चर न ऊंणैछी
बजा रेडू-
कैं फिल्मी गीत न ऊंणाछी
सब ठौर ऊंणाछी भाषण
द्यखंण पणीं-सुणंण पणीं
सुंण्यौ-भारत माताकि जैक ना्र
करीब सात म्हैंण पछां
पैल फ्यार
छब्बीस जनवरीक पछां ।
तिरंग फहरूंणाछी मंत्रिज्यू (?) राजधाणि में
खालि शान करंण बा्ट
ड्वार पारि ठौक लगूंणाछी
ख्वर नांगड़ !
कि पैरी धर्मनिरपेक्ष अलोप टोपि (पत्त नैं)
कैसिट में बा्जणौछी-राष्ट्रीय गीत
सब खाल्लि ठा्ड़ छी
तिरंगाक सामुणि
गिज बुजि,
खा्जि-खुजै...
मांछर उणूंण छुं
कि गरमैल
हात-खुट हल्कूंणाछी ।
फ़िरि ग्येई मंत्रिज्यू अलग-अलग जा्ग
भाषण द्येईं, झंड फहराईं
पैरि ए जा्ग राम टोपि
दुसरि जा्ग रहीम टोपि
तिसरि जा्ग टोपिक जा्ग टोप
फीरि  चौथ जा्ग पागड़ !
ब्याव हुं सब तिर
धरी द्येईं समाइ बेर
उ झंड, उं कैसिट
उं देशभक्तिक गीत,
ना्र, भाषण,
उं शहीदौंक क्वीड़
उं देशभक्तिक किस्स....
............सब तिर
और फिरि-
सब स्ये ग्ये्ईं-म्येरि’ई चार
द्वि अक्टूबर तलक ।

(स्व. नरसिम्हाराव ज्यूक प्रधानमन्त्रित्व काल में 'पनर अगस्ता्क दिन' लेखी कविता)

शनिवार, 24 अगस्त 2013

गाड़ ऐ रै...

ओ उच्च अगाश में भैटी ता्रो
मणीं मुंणि हुणि त चा्ओ !
बचै ल्हिओ म्या्र घर कैं
वां गाड़ ऐ रै।
हर तरफ बगणौ गरम पांणि
खून कूंछी-जकैं मैंस
मलि जिहाज में उड़ि
सरकार चुनावौ्क निसांण ल्यै रै।
मिं लै जै ऊंछी मणीं,
सुणि ऊंछी वीक हवाइ स्वींण
कि करूं म्यर नौं कै बेर
उ इतू टाड़ बै ऐ रै।
म्या्र गिजन हासिल न्हैं हंसि
चलो यौ के बात नि भै
यां तौ सबूकै लिजी
आंसनै्कि यैसि गाड़ ऐ रै।
म्या्र घर लै ऊंछी सौंण
झुलछी झुल भै-बैंणी
अफसोस आ्ब न लागा्ल
पैलियै यैसि डाड़ ऐ रै।
समेरि हा्ली मैंल लै
आपंण समान, छा्र और मा्ट
पर भा्जूं त कॉ भाजूं
मैंस कूनईं-भा्जो बाड़ ऐ रै।



शनिवार, 8 जून 2013

नईं जमा्न में...



अजब-गजब द्यखौ
(उत्तराखंड आंदोलना्क) उ जमा्न में
मैंस देखणांछी स्वींण
राज्या्क विकासा्क
गौं-गाड़न में द्यखौ-कर्फ्यू
घुघुतिकि घुर-घुर में सुणीं
बन्दूगौंकि गोइ
जां लागि रूंछी रोज
भा्इ-चारा्क म्या्व
वां ज्वानौंकि लाश द्ये्खीं
जां है रूंछी, हंसि-ठा्ठ-खुसि
वां इज-बाबुकि डाड़ पड़ी द्येखी
बजार में द्येखीं
धरना, जुलूस, हड़ताल
मरीनैकि जिन्दाबाद
ज्यूनौंकि मुर्दाबाद
ठो्सीणांछी मैंस-स्यैंणी
झेलून बड़ पैमा्न में,
अजब-गजब द्यखौ
उ जमा्न में ।
.................................
पहाड़ों में द्यखौ बड़ बिकास
गौं-गौं तक दये्खीं सड़क
रिटणाछी जीप, गाड़ि, मोटर-कार
घर-घर में द्यखौ टी.बी.
एक-एक टी.बी. में द्य्खौ
छै-छै डिसौंक कनैक्सन
पेट खा्लि हो भलै
गा्ड़ खड़ि हुं, खंणि बिचै ग्येईं भलै
डा्व बोट खोपि-काटि बेचि हालीं भलै
के रुजगार न्है भलै
घरक काम करंण में शरमै भै
नईं-नईं मिजात करणै भै
बिड़ि-सिगरेट-सुर पींणै भै
खांण हुं क्रीमरौल, बिश्कुट चैनेरै भै
ए दुसरैकि हौंसि में
हिन्दी-हिंग्लिश
कुमाउनी हिमाउंनी बंडण द्येखी
मैंस द्येखीं भैटी रात्ति-ब्याव
जुवा्क फड़न में
अजब-गजब द्यखौ
यौ नई जमा्न में ।

(मेरे इसी माह प्रकाशित हो रहे कुमाउनी कविता संग्रह 'उघडी आँखोंक स्वींण' से...)